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Tuesday, May 17, 2022
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नायक-नायिकाओं के संघर्ष में तपते सूरज की अभिव्यक्ति | The expression of the scorching sun in the struggle of hero-heroines


भावना सोमायाएक घंटा पहले

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फिल्म ‘रुदाली’ का एक दृश्य।

हमने शायद इस बारे में कभी नहीं सोचा, लेकिन हमारा सिनेमा भी अलग-अलग मौसमों के लिए अलग-अलग मूड को परिभाषित करता है। इसलिए जबकि मानसून को शृंगार व कामुकता (हमारे कई वर्षा गीतों को याद करें) और वसंत को असंख्य रंगों व उत्सव के साथ जोड़ा जाता है तो मेरी राय में गर्मी का संबंध संघर्ष के साथ है। ‘पहेली’ की दुल्हन याद होगी, जब वह थोड़ी देर आराम करने के लिए गांव के तालाब के पास रुकती है। तपती गर्मी में यह रानी मुखर्जी के लिए एक संघर्ष की शुरुआत होती है। इसलिए जबकि हम सभी मौजूदा समय में तपती गर्मी से जूझ रहे हैं, तो मैं फिल्मों में गर्मियों के इसी संघर्षपूर्ण चित्रण को अपने इस कॉलम में पेश करने से नहीं रोक पा रही हूं।

शुरुआत के.ए. अब्बास की ‘दो बूंद पानी’ से। इसमें पानी की तलाश में गांव की महिलाएं सिर पर बर्तन लेकर मीलों पैदल चलती हैं। ‘रुदाली’ में डिंपल कपाड़िया रेत पर नंगे पैर भटकती हैं, तो मृणाल सेन की ‘जेनेसिस’ में शबाना आज़मी चिलचिलाती धूप में बंजर खेत में काम करती नजर आती हैं। सत्यजीत रे की ‘सद्गति’ में लकड़हारे की भूमिका निभा रहे ओम पुरी लू के थपेड़ों में दम तोड़ देते हैं। फिल्म में उनकी पत्नी स्मिता पाटिल इतनी बेबस होती हैं कि कुछ नहीं कर पातीं।

महेश भट्ट की पहली फिल्म ‘मंजिलें और भी है’ में तीन भगोड़े दोषी रेगिस्तान में भागते हुए अपने रास्ते की तलाश में हैं, लेकिन उन्हें मंजिल नहीं मिल पा रही है। वे कई दिनों से भाग रहे हैं और अब नायिका प्रेमा नारायण हर जगह पानी का भ्रम पैदा कर रही है। और जब भ्रम टूटता है, तो वह स्पिरिट भी टूट जाती है। विजय आनंद की ‘गाइड’ में देव आनंद एक मंदिर के बाहर सो रहे होते हैं। तभी एक पुजारी उन्हें अपनी शॉल ओढ़ा जाता है। और अब दोषी राजू को स्वामी समझ लिया जाता है। ग्रामीण यह मान बैठते हैं कि स्वामी वर्षा लाएंगे। क्लाईमेक्स में एक लंबा सिक्वेंस है जिसमें वहीदा रहमान तपते सूरज की गर्मी को झेलते हुए तब तक सड़क पर चलती रहती हैं, जब तक कि वह देव आनंद तक नहीं पहुंच जातीं।

अलग-अलग निर्देशकों ने अलग-अलग मूड को चित्रित करने के लिए गर्मी के मौसम का दृश्यांकन किया है। रमेश सिप्पी ने ‘शोले’ में अत्याचार की इंतहा को दिखाने के लिए असहाय हेमा मालिनी को चमकते सूरज के नीचे चट्‌टानी धरती पर बिखरे कांच के टुकड़ों पर नृत्य करवाया। ‘विजेता’ में गोविंद निहलानी विमान दुर्घटना के बाद एक विदेशी धरती पर फंसे युवा पायलट कुणाल कपूर के भावनात्मक क्षणों को कैप्चर करते हैं जो उस समय केवल अपनी मां (रेखा) के बारे में सोचते हैं।

अमोल पालेकर की ‘थोड़ा सा रुमानी हो जाए’ सूखे से संघर्ष करने पाले वाले एक गांव और प्यार की तलाश में निकली अकेली लड़की की कहानी है। एक दिन नाना पाटेकर गांव आते हैं और ग्रामीणों को पानी का पता लगाने में मदद करते हैं। और वे अनजाने में अकेली नायिका को उसका प्यार पाने में भी मदद करते हैं।

आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ को भला कौन भूल सकता है? यह बारिश का इंतजार करते और सूखे के साथ-साथ अंग्रेजों के जुल्म को झेलते चंपानेर की कहानी थी। क्लाईमेक्स में आमिर खान और उनकी टीम मैच जीत लेती है और साथ ही लगान से भी उन्हें मुक्ति मिल जाती है। ‘काले मेघा काले मेघा पानी तो बरसाओ…’ जीत की परिणति है, लेकिन दशकों से मेरा सबसे पसंदीदा ग्रीष्मकालीन दृश्य ‘मजबूर’ फिल्म का है जिसमें अमिताभ बच्चन एक व्यस्त सड़क के बीच में अपना सिर पकड़े हुए खड़े हैं। जैसे-जैसे लोग और वाहन गुजरते हैं…, चमकते सूरज के साथ बच्चन के एक्सप्रेशन गूंथते जाते हैं। यह दृश्य इस थ्रिलर का टर्निंग पॉइंट था। अगर आपने यह मूवी पहले नहीं देखी है तो अब देख सकते हैं।

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